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जाम-ऐ-इन्सां के पावन दिवस पर हज़ूर पिताजी के मुखारबिंद से गाये हुए अनमोल वचन !

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जाम--इन्सां की महक ने महकाए दो साल ,
जिसने
पिया श्रद्धा के साथ वो हो गया मालो-माल !!!!!

जिनके अन्दर सरूर मालिक का होता है!
उनके अन्दर सच्चे रहबर का नूर उसी मालिक का होता है!
आप
में नूर है, हाज़िर हज़ूर है !
नज़रो से नहीं दूर है चारो तरफ़ भरपूर है !
और
क्या क्या बतायें उसी का रहमोकरम है !
यही
हमारा धर्म है ,मालिक के साथ हँसना ,
मालिक
के साथ खिलना है !

यह जाम है ,मामूली समझना !
मालिक
का रहमोकरम भरा है, खाली समझना !
पर
चखेगा वो जिसके अन्दर है विश्वास ,वो पुरा नज़ारा लेगा ,
बाकि
तो देखा -देखी ही सही,पर आगे जरूर बढेगा !
पर
असली नज़ारे वो ही लेता है जो अमल किया करते है !
अमल
के बिन तो प्रेमी नहीं जिया करते है !

वो दया के सागर है ,भरते हर किसी की गागर है !
बस
खाली होनी चाहिए , फ़िर देखिये कैसे भर जाती है!
बिन बतायें अन्दर काम कर जाती है !
उससे
मांगने की जरुरत नहीं ,बिना मांगे देता है !
और
ऐसे देता है की बदले में एक पाई नहीं लेता है!
और दो जहान के दर्श पल में करवा देता है !

धन-धन सतगुरु तेरा ही आसरा